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23 Oct 2021 5:44 PM
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आइए, जानते हैं कि साल 2017 में इन शख्शियतों ने क्या खोया और क्या पाया ?

नई दिल्ली. साल के आखिरी नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह का जादू तमाम चुनौतियों और अटकलों के बावजूद फिर से चला. दिसंबर 2017 में ही कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष से अध्‍यक्ष बने राहुल गांधी और अन्‍य विपक्षी दल अगर खुद को मजबूत विकल्‍प नहीं बना सके तो भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्‍त भारत’ का दावा और मजबूत नजर आता दिख सकता है. इस साल भारतीय लोकतंत्र की एक और खूबसूरती सौम्‍य-सरल राजनेता रामनाथ कोविंद के राष्‍ट्रपति चुने जाने के रूप में भी दिखी.

जानते हैं कि इस साल इन शख्शियतों ने क्या खोया और क्या पाया?

1- नरेंद्र मोदी

लोकतांत्रिक देशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल भारत के सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं, बल्कि यह भी साबित कर रहे हैं कि आगामी आम चुनाव में उन्हें चुनौती दे सकने वाला कोई नहीं है. ऐसे उदाहरण विरले ही हैं जब किसी प्रधानमंत्री ने सत्ता के तीन साल बाद भी अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी हो, लेकिन देश-विदेश की संस्थाओं के सर्वेक्षण यही रहे हैं कि मोदी भारत की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शख्सियत बने हैं. एक के बाद एक राज्यों में होने वाले चुनाव भी उनकी लोकप्रियता पर मुहर लगा रहे हैं. सबसे ताजा मुहर गुजरात और हिमाचल ने लगाई. अगर भाजपा गुजरात बचा सकी तो सिर्फ और सिर्फ मोदी की वजह से. गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के समक्ष जैसी चुनौती पेश की और इस चुनौती का सामना करने के क्रम में मोदी जिस तरह अतिरिक्त मेहनत करते नजर आए उससे ऐसा लगा कि कहीं उनकी लोकप्रियता का रथ थमने वाला तो नहीं, नि:संदेह मोदी की लोकप्रियता का कारण यह नहीं है कि वे ‘अच्छे दिन आ गए’ जिनका वायदा किया गया था, बल्कि आम लोगों का यह भरोसा है कि मोदी बिगड़ी चीजों को बनाने की कोशिश पूरे जतन से कर रहे हैं और दुनिया में देश के मान-सम्मान को बढ़ा रहे हैं. तमाम समस्याओं के बाद भी आम जनता उन्हें अपने-अपने कारणों से पसंद कर रही है, लेकिन शायद लोग जोखिम उठाकर कठोर फैसले लेने की उनकी क्षमता के सबसे ज्यादा कायल हैं. वह इस कसौटी पर खरे भी उतर रहे हैं.

 

2 – रामनाथ कोविंद
रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति पद की दौड़ में तो क्या चर्चा में भी नहीं थे, लेकिन जैसे ही उनके नाम की घोषणा हुई विपक्ष भी यह मानने को विवश हुआ कि उनकी राह रोकना उसके वश की बात नहीं. इसकी बड़ी वजह रही लंबे राजनीतिक करियर के बाद भी उनका विवादों से दूर रहना और एक सौम्य-सरल राजनेता की आदर्श छवि से लैस दिखना. रामनाथ कोविंद सादगी पसंद और विवादों से दूर रहने वाले नेता का सर्वोच्च पद पर आसीन होना भर नहीं रहा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती का बखान भी रहा. राष्ट्रपति पद धारण करने के पहले वह बिहार के राज्यपाल रहे, लेकिन देश ने उनके बारे में यह जरूरी बात उनके राष्ट्रपति प्रत्याशी बनने के बाद ही जानी कि वह प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव भी रह चुके हैं. देश के सर्वोच्च पद पर जुडे देश के लाखों-करोड़ों लोगों और खासकर दलित-वंचित तबके के लोगों के बीच आशा का संचार किया उसे कानपुर देहात के परौंख जैसे गांवों के बाशिंदे हैं ऐसे लोग 14वें राष्ट्रपति पद की शपथ लेते हुए रामनाथ कोविंद के इन प्रेरणादायक शब्दों को शायद ही भूले हों,

”आज भी जब बारिश हो रही है तो देश में ऐसे कितने ही रामनाथ कोविंद होंगे जो बारिश में भीग रहे होंगे, खेती कर रहे होंगे और शाम को रोटी मिल जाए इसके लिए मेहनत में लगे होंगे…।’’

3 – अमित शाह

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह (भाजपा के चाणक्‍य) तो सभी लोग जानते हैं लेकिन फोटो से बहुत कम ही वाकिफ हैं. चाणक्य, जो राजनीति में हर कोई बनना चाहता है. वरना कोई कारण नहीं है कि सिर्फ विपक्षी दलों पिछले तीन-साढ़े तीन साल में ही शाह ने यह स्थापित कर दिया है कि उन्हें जीत का मंत्र भी आता है और वह विरोधियों के लिए व्यूह रचना की कला से भी वाकिफ हैं. भाजपा के चाणक्‍य सबसे ऊपर परिश्रम और क्षमता इतनी जो सीमाओं से परे हो. यही खूबियां हैं जिसने महज चार-साढ़े चार वर्ष पहले राष्ट्रीय राजनीति में आने वाले अमित भाई को चाणक्य राजनीति का शाह बना दिया है. बहुत कठिन माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में उन्होंने 300 सीटों का लक्ष्य रखा तो हासिल कीं 325 सीटें. हर बार असंभव दिखने वाले लक्ष्य को परास्त करना. गुजरात, भाजपा का नारा तो कांग्रेस मुक्त भारत का रहा है, लेकिन वाम दल भी इसकी चपेट में है. अमित शाह पार्टी के अंदर उन्होंने यह स्थापित कर दिया है कि पद कद से नहीं काम से तय होगा।

4 – राहुल गांधी

File Photo


राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए. इसी के साथ वह सबसे पुरानी पार्टी को नए दौर में ले जाने वाले युवा नायक बन गए, लेकिन बतौर पार्टी अध्यक्ष जैसे उनके भाषण पहले की तुलना में धारदार हुए हैं वैसे ही उनके ट्वीट भी. हालांकि इसका ठीक-ठीक जवाब नहीं मिल पाया कि उनके ट्वीट को इतने रिट्वीट कहां से मिल रहे हैं, इस छवि से मुक्ति के बाद कांग्रेस समर्थकों और नेताओं को इंतजार है. क्योंकि उनके वैसे बयान उन्हें और साथ ही पार्टी को मुश्किल में डालते ही रहते हैं जैसा उन्होंने अमेरिका में दिया और जिसके तहत वंशवादी राजनीति के पक्ष में खुल्लम खुल्ला यह कह दिया कि भारत में तो ऐसे ही चलता है. आक्रामक और मुखर होने के साथ चुटीली भाषा से लैस हुए राहुल गांधी गुजरात में पार्टी की सीटों में बढ़त से उत्साहित दिख रहे हैं, लेकिन इस बारे में कुछ कहना कठिन है कि उनका मंदिर प्रेम बना रहेगा या फिर वह अन्य किसी अवतार में नजर आएंगे. उन्होंने यह तो साबित किया कि वह खुद में बदलाव लाने में समर्थ हैं और इस क्रम में उन्हें जनेऊधारी हिंदू की उपाधि धारण करने से भी हर्ज नहीं, लेकिन अभी यह साबित होना शेष है कि उनकी इस सामर्थ्‍य से पार्टी को ताकत मिलेगी या नहीं?

5- योगी आदित्यनाथ

file photo


उत्तर प्रदेश के आरंभिक दो-तीन महीने भरपूर उत्साह और नई घोषणाओं थे. योगी आदित्यनाथ गुजरात के 20 जिलों में 36 सभाएं. उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में वे 40 सभाएं करते हैं. किसी मुख्यमंत्री द्वारा निकाय चुनाव में इतनी सभाएं करने का यह पहला उदाहरण था और उनके आलोचकों ने इस पर प्रश्न भी उठाए,परंतु यही प्रदेश और देश की सीमाओं के बाहर मॉरीशस तक ले गया. जब योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित हुआ तो अनेक भृकुटियां चढ़ीं. लोगों को लगा कोई मठ प्रमुख इतने बड़े और जटिल राज्य का प्रशासन भला कैसे संभाल सकता है. योगी के भगवा वस्त्र और प्रखर वाणी आम और खास सबको भा रही. फिर वह समय आया जब कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे और विपक्ष आक्रामक हुआ. परंतु पिछले कुछ समय से कानून का राज दिखा है और पुलिस की सख्ती ने सकारात्मक माहौल बनाया है.

मनोंरजन / फ़ैशन

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