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24 Oct 2021 5:44 PM
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सरकारी नीति की मार. अपनी जेब से टैक्स भरने को मजबूर हैं ठेकेदार

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– 10 परसेंट लाभ, 12 परसेंट जीएसटी, गुणवत्ता की हो रही एेसी-तैसी-मेनहेडिंग
न विभाग कुछ सुनना चाहता है और न सरकार
गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) एक जुलाई से लागू हो गया है. तीन माह बीत गये लेकिन जीएसटी की जटिल प्रक्रिया से लाइसेंसी ठेकेदार उबर नहीं पाये हैं. 12 प्रतिशत जीएसटी का भुगतान कर रहे हैं, लेकिन उनका वह पैसा रिटर्न नहीं मिल रहा है. न विभाग कुछ सुनना चाहता है और न सरकार.

जीएसटी के पेंच में लाइसेंसी ठेकेदार फंसते जा रहे हैं. स्थिति यह है कि जीएसटी के कारण ठेकेदारों का बिल दो से चार माह तक विभाग में फंस रहा है. उनकी परेशानी बढ़ गयी है. जीएसटी में आ रही परेशानी को लेकर प्रभात खबर ने लाइसेंसी ठेकेदारों से बातचीत की और उनकी समस्याओं को सुना. आइये जानें जीएसटी पर क्या कहते हैं ठेकेदार.

योजना के प्राक्कलन में 12 प्रतिशत समाहित करे सरकार
जो भी टैक्स कटौती हो. वह प्राक्कलन में समाहित हो. जिस तरह लेबर सेस प्राक्कलन में जुड़ा रहता है, उसी तरह जीएसटी को भी प्राक्कलन में जोड़ा जाये.
शकील अहमद
जीएसटी से परेशानी हो रही है. काम करने के बाद भी बिल का भुगतान नहीं हो रहा है. ज्यादा बिल्डिंग डिवीजन में परेशानी आ रही है. सरकार को पहल करनी चाहिए.
नवनीत नीरज
सेंट्रल की योजनाओं में 12 प्रतिशत जीएसटी जोड़कर प्राक्कलन तैयार किया जाता है. लेकिन राज्य सरकार की योजनाओं में प्राक्कलन से जीएसटी को अलग रखा गया है.
इंद्रजीत कुमार मंडल
काम कराने के बाद विभाग में पेमेंट नहीं हो रहा है. जीएसटी व खनन की गाइड लाइन स्पष्ट नहीं है. हम ठेकेदार पिस रहे हैं. दो माह से बिल्डिंग डिवीजन में बिल फंसा हुआ है.
अरुण कुमार यादव
जीएसटी का साइट काफी धीमा चलता है. बिल में थोड़ी सी गड़बड़ी होने पर रांची दौड़ लगानी पड़ती है. 10 प्रतिशत ठेकेदारी में प्रोफ्रिट है और 12 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ रहा है.
राजेंद्र रवानी
ऑन लाइन टेंडर में प्राक्कलित राशि से कम कोट किया जाता है. इस पर जीएसटी अलग से 12 प्रतिशत लगता है. कॉन्ट्रैक्ट का प्रोफिट लगभग 10 प्रतिशत है. ऐसे में गुणवत्ता प्रभावित होगी.
प्रकाश चौधरी
जीएसटी का 12 प्रतिशत टैक्स समाहित कर ही विभाग को निविदा निकालनी चाहिए. बिहार की तर्ज पर प्राक्कलन राशि से पांच प्रतिशत कम रेट कोट करने की व्यवस्था शुरू हो.
राजीव रंजन कुमार
जीएसटी सिरदर्द बन गया है. पूर्व में प्राक्कलित राशि में वैट समाहित होता था लेकिन जब से जीएसटी लागू हुआ है. जीएसटी को अलग कर निविदा निकाली जा रही है
नंद प्रकाश सिंह

जीएसटी से क्यों हो रही परेशानी …?
एक जुलाई के पहले लाइसेंसी ठेकेदार वैट देते थे. सरकार की ओर से जो भी निविदा निकलती थी, उसमें वैट व लेबर सेस समाहित होता था. जीएसटी लागू होने के बाद निविदा में जीएसटी को समाहित नहीं किया जा रहा है. हालांकि एक प्रतिशत लेबर सेस आज भी योजना में समाहित कर निविदा निकाली जा रही है. ठेकेदारों को निविदा का दस प्रतिशत प्रोफिट मिलता है. जबकि उनका 12 प्रतिशत जीएसटी जमा करना पड़ रहा है. ऐसे में ठेकेदारों को अपनी पूंजी से 2 प्रतिशत टैक्स देना पड़ रहा है. यही नहीं विभाग के ऊपर से लेकर नीचे के अधिकारियों के बीच 20 प्रतिशत से अधिक तक पीसी देना पड़ता है. चारों तरफ से संवेदक फंसते जा रहे हैं. सरजमीन पर काम पर जनता का गुणवत्ता को ले दबाव रहता है. अब ठेकेदार चरणबद्ध आंदोलन का मूड बना रहे हैं.

यह राज्यस्तरीय मामला है. यहां की समस्या नहीं बल्कि राज्यभर में यह समस्या आ रही है. पिछले दिनों राज्यस्तरीय बैठक में मामला को उठाया गया था. वरीय अधिकारी भी ठेकेदारों की समस्या से अवगत हैं. संशोधन की बात चल रही है, लेकिन अब तक कोई लेटर नहीं आया है.
पंकज कुमार, कार्यपालक अभियंता भवन निर्माण विभाग

मनोंरजन / फ़ैशन

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