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23 Oct 2021 5:44 PM
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देशभक्ति साबित करने के लिए सिनेमाघरों में राष्ट्रगान पर खड़ा होना जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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शीर्ष अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के लिये खड़ा नहीं होता है तो ऐसा नहीं माना जा सकता कि वह ‘कम देशभक्त’ है.

कभी सरकार चाहेगी कि लोग सिनेमाघरों में टी शर्ट्स और शार्ट्स में नहीं जायें…
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने समाज को नैतिक पहरेदार की आवश्यकता नहीं है जैसी टिप्पणी करते हुये कहा कि अगली बार सरकार चाहेगी कि लोग सिनेमाघरों में टी शर्ट्स और शार्ट्स में नहीं जायें क्योंकि इससे राष्ट्रगान का अपमान होगा. पीठ ने कहा कि वह सरकार को ‘‘अपने कंघे पर रखकर बंदूक चलाने की अनुमति नहीं देगी. पीठ ने इसके साथ ही सरकार से कहा कि वह राष्ट्रगान को नियंत्रित करने के मुद्दे पर विचार करे.

पीठ ने कहा, लोग सिनेमाघरों में मनोरंजन के लिये जाते हैं. समाज को मनोरंजन की आवश्यकता है. हम आपको हमारे कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की अनुमति नहीं दे सकते. लोगों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिये सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खडे होने की आवश्यकता नहीं. अपेक्षा करना एक बात है लेकिन इसे अनिवार्य बनाना एकदम अलग बात है. नागरिकों को अपनी आस्तीनों पर देशभक्ति लेकर चलने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता और अदालतें अपने आदेश के माध्यम से जनता में देशभक्ति नहीं भर सकती हैं. शीर्ष् अदालत ने सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्र गान बजाने के लिये पिछले साल श्याम नारायण चोकसी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ये सख्त टिप्पणियां की.

टिप्पणियों के विपरीत, न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही पिछले साल एक दिसंबर को सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले अनिवार्य रूप से राष्ट्र गान बजाने ओैर दर्शकों को सम्मान में खडे होने का आदेश दिया था.

अटार्नी जनरल वेणुगोपाल : भारत विविधताओं वाला देश है और एकरूपता लाने के लिये देश के सभी सिनेमाघरों में राष्ट्र गान बजाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि यह सरकार के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि क्या सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाया जाना चाहिए और क्या लोगों को इसके लिये खड़ा होना चाहिए.

न्यायमूर्ति चन्द्रचूड: ध्वज संहिता में संशोधन करने से कौन रोक रहा है? आप इसमें संशोधन कर सकते हैं और प्रावधान कर सकते हैं कि राष्ट्रगान कहां बजाया जायेगा और कहां नहीं बजाया जा सकता. आजकल तो यह मैचों, टूर्नामेन्ट और यहां तक कि ओलंपिक में भी बजाया जाता है जहां आधे दर्शक तो इसका मतलब भी नहीं समझते हैं. न्यायालय ने केन्द्र से कहा कि वह देश भर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने के लिये राष्ट्रीय ध्वज संहिता में संशोधन के बारे में नौ जनवरी तक उसके पहले के आदेश से प्रभावित हुये बगैर ही विचार करे. इस मामले में अब नौ जनवरी को आगे विचार किया जायेगा.

मनोंरजन / फ़ैशन

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